Friday, August 27, 2010

नाविक चचा (शरदोत्सव के वो दिन)

कहानी शुरु होती है शरदोत्सव के मेले से , जहा पे हमारे प्रिय नाविक चचा आये हुए थे.
अगर आप लोग कभी मेले में गए हो तो शायद आप लोगो ने देखा होगा की एक बड़ी सी नाव आपको हवा की सैर कराती है, लेकिन उसमे बैठना भी बड़ी हिम्मत का काम है.
बस पहुच गए हम भी शरदोत्सव में, टहलते हुए तीनों (दर्पण, जे. पी. , रवि ) पहुचें नाविक चचा की नाव के नज़दीक , अब पैसे तो इनके पास थे नहीं जो टिकट खरीद के नाव की सैर कर सकें, कुछ योजना तो बनानी थी.
योजना बनाने मे चतुर ये लोग (शाहरुख़ के फेन तो थे ही) मतलब पटाने में माहिर, अब ये 'टास्क' जे. पी. दा ग्रेट को दिया गया, उसने ऐसी चतुरता से नाविक चचा के सहयोगी से बात की वो मान गया और हम लोग निकल पड़े नाव की सहर पे.
भाई लोगो पहली बार हवा मै उड़ने वाली नाव मै बैठकर जो हमको आसमान के तारे नज़र आये वो मै क्या बताऊ , लकिन धीरे धीरे डर निकल गया (डर के आगे ही जीत है ) बस फिर क्या था अब सोचना ये था की अगर अब उतर गए तो शायद दुबारा मौका ना मिले, यही सोचकर अगली योजना बना डाली , नाव में कुर्सी के नीचे छिपने की.
जैसे ही नाव रुकी सब उतर गए लकिन हम तीनो नाव की कुर्सी के निचे छिपे रहे. नाविक चचा को जरा भी अंदेशा नहीं था की हम वहा पे है, बस ऐसा ही २-३ बार करने के बाद अचानक नाविक चचा की नजर पड़ी बोला "अरे तुम लोग अभी तक यहाँ कैसे हो", हमने बोला टिकट ले के आये है. बस वो समझ गया और डंडा ले के आ गया , अरे हमने ऐसी लाप मारी की नाव से शीधा नीचे , बीतती काट दी हमने वहा से और एक कोने मै जा के पेट पकड़ के हसने लगे, वास्तव मै कमाल के दिन थे वो.
एक बार हमारे दर्पण भाई को वार्षिकोत्सव मै दुकान लगाने का शुर(धुन) पैदा हुआ. लगा दिया एक खुन्चा, चाय, काफी, ब्रेड, पकोड़ा और केक वाह क्या लाजवाब चीजे बनायीं थी बस फर्क सिर्फ इतना था की ये सब इसने नहीं बनायी थी. कभी एक चाय तक तो बनायीं नहीं ये सब कहा से बनाएगा,
कई लोग आये उन्होंने काफी तारीफ करी इनके खाने की,मैंने भी जा के देखा देखने मै तो बढ़िया लग रहा था लकिन पता नहीं खाने मै कैसा था.
और देखो इन भाई साहब को बोले भाई जो भी लेना हो पहले पैसे दो नकद तभी दूंगा, दरसल ये हमरी एक सोची समझी योजना थी, हमको ऐसा दर्शाना था की अगर कोई ग्राहक आये तो उसके सामने हम दर्पण से अगर बिना पैसे के कुछ मागे तो वो यही कहेगा "पहले पैसा, आज से उधर बंद" ताकि कोई मुफ्तखोर आये तो वो खाने से पहले पैसा दे और इसकी दूकान चलती रहे.
भाई लकिन ये दिल का बड़ा सही बंदा था लोगो ने इतनी मुफ्तखोरी करी की सर्दोत्सव मै अभी १० दिन शेष बचे थे मगर भाई साहब को अपने दुकान २ दिन बाद ही बंद करनी पड़ी, ये भाई साहब उधारी मै आ गए थे (कंगाली मै आटा गिला).
...to be continued!!!!!!!!!

3 comments:

  1. bhai logon ye koi chadm blogger hai iski baat pe yakeen na kiya jaye.

    :)

    Jaisa ki aap log jante hi hain ki main ek seedha, saccha evm nekdil insaan hoon.

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  2. :)

    aur jo darpan ji...aapke profile waale photo mein baaki ke 3 log hain...


    wo kyaa seedhe, sachche, EVM nekdil ...nahin hain....????

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  3. सच्ची कहानिओं पर आधारित...हम्म
    पर पात्रों के नाम भी बदलने थे न...हो गयी न गलती :)

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